(L to R) Achala Sharma and Mridula Garg

हिंदी उर्दू साहित्य में कथित रूप से अश्लील साहित्य लिखने के लिए जिन लोगों पर मुक़दमें  चले हैं उनमें मंटो और इस्मत चुग़ताई के नाम सब से ऊपर आते हैं। लेकिन शायद बहुत लोगों को याद ना हो कि हिंदी की सुप्रसिद्ध उपन्यासकार मृदुला गर्ग पर भी ‘अश्लील लेखन’ के आरोप लगे और मामला गिरफ़्तारी तक जा पहुँचा।

अनगिनत कहानियों और उपन्यासों की रचयिता लेखिका मृदुला गर्ग (जन्म १९३८) याद करती हैं कि १९७९ में प्रकाशित हुए उनके उपन्यास ‘चित्तकोबरा’ पर अश्लील लेखन का लेबल लग गया और एक दिन अचानक दो पुलिस वाले उनकी गिरफ़्तारी का वॉरंट लेकर घर पहुँच गए। उस वक़्त उन्हें गिरफ़्तारी से बचाने वाले प्रतिष्ठित वकील एल. एम. सिंघवी थे। और लेखक बिरादरी में उनके पक्ष में बोलने वालों में इकलौती आवाज़ हिंदी के सुप्रसिद्ध कथाकार जैनेंद्र कुमार की थी।

मृदुला गर्ग को इस बात का गहरा खेद है कि जब ‘चित्तकोबरा’ को लेकर विवाद उठा तो हिंदी के समकालीन लेखकों में से किसी ने उनका साथ नहीं दिया।बीबीसी हिंदी की पूर्व अध्यक्ष अचला शर्मा के साथ एक बेबाक बातचीत में मृदुला गर्ग हिंदी के कुछ जाने माने प्रतिष्ठित लोगों के नाम लेने से भी नहीं हिचकिचातीं।

मृदुला गर्ग विवादों से नहीं घबरातीं। बहुत स्पष्ट शब्दों में वे कहती हैं कि महिलाओं के विषय पर तो हिंदी में कुछ को छोड़ कर किसी ने ढंग से लिखा ही नहीं। उनका विचार है कि स्त्रीवादी विमर्श जैसी कोई चीज़ हमारे यहाँ नहीं है। हमारे यहाँ स्त्री अपने अनुभव के बारे में लिखती है। उसमें थोड़ी बहुत चेतना आई है कि मैं भी इंसान हूँ और मेरी भी अपनी इच्छाएँ हैं। माँ बनना अपने आप में औरत की सबसे बड़ी सामर्थ्य है। लेकिन इसकी बात कोई नहीं करता। शोषण और संघर्ष के लेखन को स्त्री का अनुभव कहा जा सकता है मगर स्त्रीवादी विमर्श नहीं कहा जा सकता है।

जब मैंने पूछा कि ‘चित्तकोबरा’ पर उठे विवाद के बाद से पिछले चालीस साल में महिला लेखिकाओं की सोच में वे क्या परिवर्तन देखती हैं तो मृदुला जी का कहना था, ‘जो लेखिकाएँ sexuality के विषय में पुरूष की तरह लिखती हैं उसे मैं बहुत cereberal नहीं मानती।’

मृदुला गर्ग के साथ यह बातचीत २ फ़रवरी २०१९ को दिल्ली स्थित उनके घर पर रिकॉर्ड की गई थी। सिनेइंक के लिए उन्होंने अपनी एक कहानी भी रिकॉर्ड की है जो सिनेइंक हिंदी उत्सव २०१९ के अंतर्गत प्रसारित की जाएगी।

मृदुला गर्ग की लगभग तीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं जिनमें कहानी संग्रह, उपन्यास, नाटक और निबंध शामिल हैं। उनकी प्रमुख रचनाओं में ‘उसके हिस्से की धूप’(उपन्यास १९७५), ‘कितनी क़ैदें’(कहानी संग्रह १९७५), ‘वंशज’(उपन्यास १९७६), ‘टुकड़ टुकड़ा आदमी’(कहानी संग्रह १९७६), ‘डैफ़ोडिल जल रहे हैं’(कहानी संग्रह १९७८), ‘चित्तकोबरा’(उपन्यास १९७९), ‘अनित्य’(उपन्यास १९८०), ‘मैं और मैं’(उपन्यास १९८४), ‘कठगुलाब’(उपन्यास १९९६), ‘मिलजुल मन’(उपन्यास १९१०) सबसे अधिक चर्चित रहे हैं।

मृदुला गर्ग की बड़ी बहन मंजुल भगत का नाम भी हिंदी कथा जगत में सम्मान के साथ लिया जाता है और उनकी छोटी बहन अचला बंसल अंग्रेज़ी में कहानियाँ लिखती हैं।

— अचला शर्मा 

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